कविता: सब कुछ, थोड़ा बिखरा बिखरा सा – जयनंद गुर्जर

अक्सर बिखरी चीज़ों में कुछ बिखरा हुआ मिल जाता है! एक कविता, उसी बिखरेपन को समझते हुए। Continue reading कविता: सब कुछ, थोड़ा बिखरा बिखरा सा – जयनंद गुर्जर

कविता: कभी किसी का फोन आए, तो उठा लिया करना – जयनंद गुर्जर

कभी किसी का फोन आए, तो उठा लिया करो। अक्सर एक फोन कॉल जिंदगी बदल सकता है। कहने को एक कविता है, तुम इसे कहानी समझना। पढ़ना ज़रूर। Continue reading कविता: कभी किसी का फोन आए, तो उठा लिया करना – जयनंद गुर्जर

कविता: एक किताब खुलेगी, एक पन्ना पलटेगा – जयनंद गुर्जर

एक कविता में एक किताब, एक पन्ना, एक कहानी और एक किरदार, अपने आप में एक पूरी दास्तान। Continue reading कविता: एक किताब खुलेगी, एक पन्ना पलटेगा – जयनंद गुर्जर

कविता: लोग नहीं समझते है

जिंदगी के सफ़र में हम लोगों से टकराते है,
पर हर दफा लोग हमें कहां समझ पाते हैं!
पढ़िए यह कविता और जाने इस बात के कुछ पहलू,
दिल की आवाज में! Continue reading कविता: लोग नहीं समझते है

प्राची त्रेहन द्वारा लिखा गया उपन्यास “तुम से मुझ तक” की समीक्षा

इस कहानी को सिर्फ एक श्रेणी में बांध देना, इस कहानी के साथ नाइंसाफी और बेईमानी होगी।

प्राची त्रेहन द्वारा लिखित ये उपन्यास, अपने सफ़र में कई पहलुओं को होकर गुज़रता है। इस किताब के बारे में विस्तार से जानने के लिए, पढ़ते रहिए यह किताब समीक्षा। Continue reading प्राची त्रेहन द्वारा लिखा गया उपन्यास “तुम से मुझ तक” की समीक्षा

पिताजी, आप यहां, हम सब में बसते हैं!

•पिता के लिए, पुत्री के शब्दों में! पिताजी!याद आते हैंवो साथ के पल,जब बचपन मेंआपके साथ होने सेगर्मियों की छुट्टियां ही नहीं,पूरा साल एक त्यौहार होता था। याद आते हैवो लम्हें,जब सब लोगों के खिलाफ़ जाकरआप हमें देर रात तक वीसीआर परफिल्में दिखाया करते थे। याद आते हैंवो क्षण,जब आप हमेंपास के गांव में लगेमेले … Continue reading पिताजी, आप यहां, हम सब में बसते हैं!

सुना है आजकल तुम खत लिखने लगे हो!

आजकल कोई खत लिखने लगा है, पर वह खत कभी कहीं पहुंचते क्यों नहीं? क्या होता है उन खतों का? जानने के लिए पढ़ते रहिए इस कविता को! Continue reading सुना है आजकल तुम खत लिखने लगे हो!