अक्सर रूठ जाने को लोग
मोहोब्बत के खत्म हो जाने का नाम क्यों दे देते है,
किसी से दो पल बात न कर पाने को
उनकी बातों को न जताने की आदत क्यों मान लेते है।
कभी कोई नाराज़ हो जाए किसी से
तो क्यों उसे अकड़न का नाम दिया जाता है,
अकेले गुज़ारने वाले वक्त को
बेवक्त क्यों करार किया जाता है।
अंधेरे में गर कोई दो वक्त सुकून के चाहे
तो क्यों रोशनी से उसकी आंखों में तिलमिलाहट पैदा की जाती है,
जज्बातों को गर कोई पन्नों में उतार दे
तो उसे पुराने ख्यालों वाला क्यों कहा जाता है।
स्वयं के साथ कोई अगर कही घूमने निकल जाए
तो उसको अपना कहने वाले बेवफाई क्यों करार करते है,
रात में गर कोई चांद देख भी ले अगर रोशनी के लिए
तो उसे इश्क की बेड़ियों में क्यों जकड़ते है।
अगर अपनों से खुल के बात करने में सुकून है कहीं
तो लोग उसे बेशर्मी की नज़र से क्यों देखते हैं,
किसी का साथ देना, किसी के जैसा हो जाना नहीं होता
क्या इतना भी लोग नहीं समझते है।
अगर लोगों के इन क्यों को कोई तवज्जो न दे
तो कहते है इनमे अकड़ है,
इन लोगों की बातों को अपने रास्ते से हटा दें
तो कहते हैं इनमे घमंड है।
अगर यही अकड़ और यही घमड़
दिल को सुकून दे ना,
तो इन्हें मान लेना
क्योंकि इन लोगो के “क्यों” भी इन लोगों की तरह दोमुहे और ढकोसले हैं!
©जयनंद गुर्जर
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