अक्सर सूरज ढलने और
चांद निकलने
के बीच जो संध्या का समय होता है न,
जहां आसमान में सारे रंग
अपने से लगते है!
बस वैसे ही कभी कभी
ये मेरे जज़्बात हो जाते है,
जिन्हें सूरज की धूप में तुम देख नहीं पाओगे,
और चांद की चांदनी में वो तुम्हें नज़र नहीं आएंगे।
तो अगर तुम्हें उन्हें जानना हो ना,
तो सब्र करना,
और इत्मीनान से ध्यान देना
उस संध्या वाले वक्त का,
जब मेरे दिल के जज़्बात,
उन रंगों की तरह,
तुम्हें अपने से नज़र आयेंगे!
© जयनंद गुर्जर
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